सोशल मीडिया ने दुनिया को जोड़ने और सूचना के आदान-प्रदान को बेहद आसान बनाया है, लेकिन यही तकनीक अब आतंकवादी और कट्टरपंथी संगठनों के लिए भी एक प्रभावी माध्यम बनती जा रही है। फेसबुक, एक्स (X), इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, व्हाट्सएप और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कई आतंकी संगठन अपनी विचारधारा फैलाने, युवाओं को बरगलाने, नए सदस्यों की भर्ती करने और गुप्त रूप से संपर्क बनाए रखने के लिए कर रहे हैं। बिहार के कटिहार में पकड़े गए एक संदिग्ध आतंकी के मोबाइल से मिले डिजिटल साक्ष्यों ने इस खतरे को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
सोशल मीडिया कैसे बन रहा है आतंकवाद का हथियार
आतंकी संगठन सोशल मीडिया पर भड़काऊ वीडियो, फर्जी खबरें, भावनात्मक संदेश और धार्मिक या वैचारिक प्रचार सामग्री साझा कर युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। कई बार डीपफेक तकनीक और एडिट किए गए वीडियो के माध्यम से झूठी कहानियां गढ़ी जाती हैं, ताकि लोगों का ब्रेनवॉश किया जा सके।
टेलीग्राम, सिग्नल और अन्य एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का उपयोग गुप्त बातचीत, हमलों की योजना बनाने और सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी से बचने के लिए किया जाता है। इंटरनेट की वैश्विक पहुंच के कारण आतंकवादी संगठन सीमाओं से परे बैठकर दुनिया के किसी भी हिस्से में लोगों से संपर्क स्थापित कर सकते हैं।
डिजिटल माध्यम से फंडिंग का बढ़ता खतरा
अंतरराष्ट्रीय संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि आतंकवादी संगठन अब सोशल मीडिया, मैसेजिंग एप्लिकेशन और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आतंकी फंडिंग के लिए भी कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, फर्जी मानवीय सहायता अभियान, क्राउडफंडिंग, क्रिएटर इकोनॉमी, डिजिटल भुगतान प्रणाली, वर्चुअल एसेट्स और क्रिप्टोकरेंसी जैसे माध्यमों का उपयोग कर धन जुटाया जा रहा है। पिछले एक दशक में डिजिटल प्लेटफॉर्म एक ऐसे इकोसिस्टम में बदल गए हैं, जहां कंटेंट निर्माण, ऑनलाइन भुगतान और सीमा-पार वित्तीय लेनदेन की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इससे आतंकवादी संगठनों को फंडिंग के नए रास्ते मिल गए हैं।
एफएटीएफ की अध्यक्ष एलिसा डे आंदा माद्राजो के अनुसार, आतंकवादी वित्तपोषण अब तेजी से डिजिटल हो रहा है, जिससे अरबों लोगों तक पहुंच बनाना और हमलों के प्रभाव को कई गुना बढ़ाना पहले की तुलना में आसान हो गया है।
एआई और नई तकनीक से बढ़ी चुनौती
एफएटीएफ ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), एन्क्रिप्टेड संचार, वर्चुअल एसेट्स और ऑनलाइन भुगतान सुविधाओं ने आतंकवादी गतिविधियों को और जटिल बना दिया है। इससे निपटने के लिए सरकारों, वित्तीय संस्थानों, तकनीकी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 30 प्रतिशत से भी कम देशों ने अपने राष्ट्रीय जोखिम आकलन में डिजिटल माध्यमों से होने वाले आतंकी वित्तपोषण के खतरे को पर्याप्त रूप से शामिल किया है।
सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी सतर्कता
भारत में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) सहित विभिन्न सुरक्षा एजेंसियां सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथ फैलाने वाले नेटवर्क पर लगातार कार्रवाई कर रही हैं। वहीं, विभिन्न देशों की सरकारें सोशल मीडिया कंपनियों पर दबाव बना रही हैं कि वे आतंकवादी और चरमपंथी सामग्री को जल्द से जल्द हटाएं।
Interpol, संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी सदस्य देशों के साथ मिलकर ऑनलाइन आतंकवादी गतिविधियों की निगरानी और सूचना साझा करने पर काम कर रही हैं।
युवाओं पर सबसे अधिक खतरा
डिजिटल दुनिया में उपलब्ध हर जानकारी सत्य नहीं होती। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले वीडियो, तस्वीरें और समाचार कई बार संपादित, भ्रामक या पूरी तरह फर्जी होते हैं। ऐसे में युवा वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होता है।
सोशल मीडिया की लत मानसिक तनाव, चिंता, आत्मविश्वास में कमी और समय की बर्बादी का कारण बन सकती है। वहीं धार्मिक या वैचारिक रूप से भ्रामक सामग्री संवेदनशील युवाओं को कट्टरपंथ की ओर धकेल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम उपयोगकर्ताओं की पसंद के अनुसार सामग्री दिखाते हैं। इससे "इको चैंबर" जैसी स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति लगातार एक जैसी विचारधारा वाली सामग्री ही देखता रहता है। समय के साथ यह उसकी सोच को प्रभावित कर सकता है।
मीडिया साक्षरता की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि नागरिकों, खासकर युवाओं और अभिभावकों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सतर्क रहने की आवश्यकता है। केवल प्रमाणित और विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही भरोसा करना चाहिए। किसी भी संदिग्ध गतिविधि, भड़काऊ सामग्री या फर्जी प्रचार की जानकारी तुरंत संबंधित एजेंसियों को देनी चाहिए।
सोशल मीडिया एक शक्तिशाली और उपयोगी माध्यम है, लेकिन इसका जिम्मेदारी से उपयोग करना ही डिजिटल युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आतंकवाद और कट्टरपंथ जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीकी निगरानी, कानूनों का प्रभावी पालन, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समाज में डिजिटल जागरूकता—इन सभी की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका है।

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